समलैंगिकों के विवाह पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र सरकार को नोटिस क्यों ?

Update: 2022-11-30 10:19 GMT

सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिकों के विवाह को स्वीकृति देने के लिए 2 याचिकाएं दायर की गई हैं जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए मन बना लिया है और केंद्र सरकार को इस पर नोटिस जारी कर 4 हफ्ते में जवाब माँगा है -कोर्ट समलैंगिक विवाह को Special Marriage Act में मान्यता देने के लिए सुनवाई कर रहा है -

6 सितंबर, 2018 को 5 जजों की संविधान पीठ ने IPC की धारा 377 को निरस्त करते हुए फैसला दिया था कि समलैंगिक संबंध कोई अपराध नहीं है - बेंच में तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, फाली नरीमन, डी वाई चंद्रचूड़, ए एम खानविलकर और इंदु मल्होत्रा सदस्य थे -

केंद्र सरकार ने समलैंगिक संबंधों को मान्यता देने का पुरजोर विरोध किया था और केंद्र की सुनवाई को रोकने की मांग भी ख़ारिज कर दी थी - संविधान पीठ ने केंद्र के विरोध के बावजूद समलैंगिक रिश्तों को अपराध मानने से मना कर दिया और विदेशों में चल रही उस प्रथा को भारत में भी लागू कर दिया बिना भारतीय संस्कृति और सभ्यता को तवज्जो दिए -

फैसले में कही गई कुछ बातें इस तरह थी -

-Gay sex is no longer a crime: 'History owes an apology to members of LGBT community'

-दीपक मिश्रा और खानविलकर ने कहा -consensual sexual relationships between same-gender adults in private does not fall foul of Section 377.

-दीपक मिश्रा ने कहा -"I am what I am. So take me as I am. No one can escape from their individuality,"

-जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा -"This case is much more than just decriminalizing a provision. It is about an aspiration to realise Constitutional rights and equal existence of LGBT community as other citizens,"

-जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा -Justice Indu Malhotra, observed, "History owes an apology to members of LGBT community and their family members

- फैसले में बस इतना कहा गया कि However, it should be noted that Section 377 will still apply to bestiality (sexual intercourse between a person and an animal) and non-consensual sexual acts.

अब सवाल यह उठता है कि संविधान पीठ ने जब सरकार के एतराज को दरकिनार करते हुए फैसला दे दिया जिसके बाद कई किस्से सुने गए कि समलैंगिक जोड़े आपस में विवाह भी कर रहे हैं -

ऐसे में आज Special Marriage Act में समलैंगिकों के विवाह को मान्यता देने के लिए सरकार से सवाल पूछने की क्या आवश्यकता है - जब आपने स्वयं ही पहले फैसला कर लिया तो अब भी कर लीजिये - सरकार ने जब समलैंगिक रिश्तों को मान्यता देने से ही मना कर दिया था तो वो ऐसे विवाहों को मान्यता देने की स्वीकृति क्यों देगी -

इसलिए अदालत को अब सरकार से पूछे बिना ही स्वयं फैसला करना चाहिए जैसे पहले किया था -

सुभाष चन्द्र के अपने निजी विचार 

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